- जिशान ग़ाज़ियाबादी
जैसे ही सुप्रीम कोर्ट का संकट उजागर हुआ, जज लोया की रहस्यमई मौत एक बार फिर से चर्चा का विषय बन गई, जिनकी मौत तीन साल पहले 1 दिसंबर 2014 की सुबह को संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी। जज लोया मुंबई स्थित सीबीआई की उस स्पेशल कोर्ट केे पीठासीन जज थे, जिसमें सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर केस की सुनवाई चल रही थी। जिस दौरान जज लोया की मृत्यु हुई थी, उस वक्त इस केस के मुख्य आरोपी तत्कालीन गुजरात के गृह मंत्री और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह थे।
जज लोया की संदिग्ध हालात में हुई मौत पर उनकी बहन ने कहा था, 'उनकी मृत्यु से कुछ हफ्ते पहले उन्होंने बतौर रिश्वत 100 करोड़ रुपये की पेशकश के बारे में उन्हें बताया था'। रिश्वत देने का आरोप उन्होंने तत्कालीन बांबे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, मोहित शाह के ऊपर लगाया था। जज लोया के पिता, हरकिशन ने भी इस आरोप की पुष्टि की और यह भी आरोप लगाया कि जज लोया को मुंबई में एक आलीशान घर देने की पेशकश की गई थी। जब कारवां मैगजीन ने तत्कालीन बांबे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, मोहित शाह से इन आरोपों के बारे में पूछा तो कोई जवाब नहीं मिला। उनकी बहन ने यह भी कहा कि मोहित शाह ने जज लोया पर दबाव डाला कि 'जजमेंट जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी आए और यह भी सुनिश्चित करें कि यह उनके हक में हो'।
जैसे ही सुप्रीम कोर्ट का संकट उजागर हुआ, जज लोया की रहस्यमई मौत एक बार फिर से चर्चा का विषय बन गई, जिनकी मौत तीन साल पहले 1 दिसंबर 2014 की सुबह को संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी। जज लोया मुंबई स्थित सीबीआई की उस स्पेशल कोर्ट केे पीठासीन जज थे, जिसमें सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर केस की सुनवाई चल रही थी। जिस दौरान जज लोया की मृत्यु हुई थी, उस वक्त इस केस के मुख्य आरोपी तत्कालीन गुजरात के गृह मंत्री और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह थे।
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| अमित शाह जज लोया |
जज लोया की संदिग्ध हालात में हुई मौत पर उनकी बहन ने कहा था, 'उनकी मृत्यु से कुछ हफ्ते पहले उन्होंने बतौर रिश्वत 100 करोड़ रुपये की पेशकश के बारे में उन्हें बताया था'। रिश्वत देने का आरोप उन्होंने तत्कालीन बांबे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, मोहित शाह के ऊपर लगाया था। जज लोया के पिता, हरकिशन ने भी इस आरोप की पुष्टि की और यह भी आरोप लगाया कि जज लोया को मुंबई में एक आलीशान घर देने की पेशकश की गई थी। जब कारवां मैगजीन ने तत्कालीन बांबे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, मोहित शाह से इन आरोपों के बारे में पूछा तो कोई जवाब नहीं मिला। उनकी बहन ने यह भी कहा कि मोहित शाह ने जज लोया पर दबाव डाला कि 'जजमेंट जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी आए और यह भी सुनिश्चित करें कि यह उनके हक में हो'।
गौरतलब है कि जज लोया से पहले जज जे टी उत्पत इस केस की सुनवाई कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में यह कहते हुए इस केस का ट्रायल गुजरात से महाराष्ट्र स्थांतरित किया कि " ट्रायल की अखंडता को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि इस केस की सुनवाई गुजरात राज्य के बाहर हो "। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी आदेश दिया था कि इस ट्रायल की सुनवाई शुरू से आखिर तक एक ही जज करेंगे।
लेकिन इस आदेश की अवहेलना करते हुए सीबीआई की स्पेशल कोर्ट में इस केस के सबसे पहले जज जे टी उत्पत का ट्रांसफर 2014 की मध्यावधि को कर दिया गया। इस केस की सुनवाई के दौरान अमित शाह के लगातार पेश न होने पर जज जे टी उत्पत ने बीजेपी के अध्यक्ष को समन जारी करते हुए जून 26, 2014 को उपस्थित होने का आदेश दिया। लेकिन इसके एक दिन पहले ही जून 25, 2014 को उनका ट्रांसफर पुणे सेशन कोर्ट में कर दिया गया। जज जे टी उत्पत के बाद जज लोया को इस केस की सुनवाई सौंपी गयी।
1 अक्टूबर 2014 को जज लोया ने सुनवाई के दौरान पूछा कि अमित शाह कोर्ट में पेश क्यों नहीं हुए, जबकि वह उस तारीख को मुंबई में ही थे। उन्होंने सुनवाई की अगली तारीख 15 दिसंबर तय कर दी।
सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन के वकील मिहिर देसाई के मुताबिक, जज लोया पूरी की पूरी चार्जशीट को जांचने को लेकर काफी उत्सुक थे, जिसके पन्नों की संख्या 10,000 से भी ज्यादा थी।
जज लोया की नागपुर में मौत के बाद जज एम बी गोसावी को सीबीआई की स्पेशल कोर्ट का विशेष जज नियुक्त किया गया। गौर करने वाली बात यह है कि उन्होंने अमित शाह की रिहाई से जुड़ी अर्ज़ी की सुनवाई 15 दिसंबर, 2014 में शुरू की और महज़ दो दिन की सुनवाई के बाद 17 दिसंबर, 2014 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
दो दिनों तक चली सुनवाई के बाद और जज लोया की मृत्यु के एक महीने के अन्दर जज एम बी गोसावी ने दिसम्बर, 2014 को दिए अपने फैसले में सीबीआई के तमाम आरोपों को खारिज करते हुए अमित शाह को आरोपमुक्त कर दिया। अमित शाह के साथ 11 और व्यक्तियों को भी छोड़ दिया गया, जिनमें ज्यादातर गुजरात पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी थे। सबसे ज्यादा अचंभित करने वाली बात यह है कि जो सीबीआई यह केस लड़ रही थी, उसने उच्च न्यायालय में इसके खिलाफ कोई अपील भी दायर नहीं की थी।
यहां जज लोया की अकास्मिक मौत से जुड़े कई सवाल खड़े होते हैं , जिनका जवाब अभी मिलना बाकी है। अब उनकी फैमिली यह दावा कर रही है कि जिस तरह की लापरवाही उनके पोस्टमार्टम की रिपोर्ट तैयार करने में की गई, मौत के दौरान उनके कपड़ों व शरीर की स्थिति, उनकी मौत का समय और उनके मोबाईल का डाटा डिलीट होना, यह सब इस ओर इशारा करते हैं कि उनकी मौत संदिग्ध हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार देश की विभिन्न अदालतों में जज लोया की मृत्यु से जुड़े सभी केस व याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट में इस केस की सुनवाई करने वाली बेंच में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्र के अलावा जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ शामिल हैं।
सौजन्य से- THE CARAVAN
सौजन्य से- THE CARAVAN

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